मंगलवार, 22 सितंबर 2020

रसायन-धातु कर्म विज्ञान के प्रणेता - नागार्जुन , Nagarjuna - the pioneer of chemical-metallurgy

रसायन-धातु कर्म विज्ञान के प्रणेता - नागार्जुन। रसायन विज्ञान और सुपर धातुशोधन के जादूगर - नागार्जुन

🔶 सनातन कालीन विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में रसायन एवं धातु कर्म विज्ञान के सन्दर्भ में नागार्जुन का नाम अमर है ... ये महान गुणों के धनी रसायनविज्ञ इतने प्रतिभाशाली थे की इन्होने विभिन्न धातुओं को सोने (गोल्ड) में बदलने की विधि का वर्णन किया था। एवं इसका सफलतापूर्वक प्रदर्शन भी किया था।

🔶 इनकी जन्म तिथि एवं जन्मस्थान के विषय में अलग-अलग मत हैं। एक मत के अनुसार इनका जन्म द्वितीय शताब्दी में हुआ था। अन्य मतानुसार नागार्जुन का जन्म सन् 9 31 में गुजरात में सोमनाथ के निकट दैहक नामक किले में हुआ था,

🔶 रसायन शास्त्र एक प्रयोगात्मक विज्ञान है। खनिजों, पौधों, कृषिधान्य आदि के द्वारा विविध वस्तुओं का उत्पादन, विभिन्न धातुओं का निर्माण व परस्पर परिवर्तन तथा स्वास्थ्य की दृष्टि में आवश्यक औषधियों का निर्माण इसके द्वारा होता है।

🔶 नागार्जुन ने रसायन शास्त्र और धातु विज्ञान पर बहुत शोध कार्य किया। रसायन शास्त्र पर इन्होंने कई पुस्तकों की रचना की जिनमें 'रस रत्नाकर' और 'रसेन्द्र मंगल' बहुत प्रसिद्ध हैं। रसायनशास्त्री व धातुकर्मी होने के साथ साथ इन्होंने अपनी चिकित्सकीय सूझबूझ से अनेक असाध्य रोगों की औषधियाँ तैयार की। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें 'कक्षपुटतंत्र', 'आरोग्य मंजरी', 'योग सार' और 'योगाष्टक' हैं।

♦️ रस रत्नाकर ग्रंथ में मुख्य रस माने गए निम्न रसायनों का उल्लेख किया गया है-

◼️ (1) महारस (2) उपरस (3) सामान्यरस (4) रत्न (5) धातु (6) विष (7) क्षार (8) अम्ल (9) लवण (10) भस्म।

♦️ इतने है महारस -

◼️ (1) अभ्रं (2) वैक्रान्त (3) भाषिक (4) विमला (5) शिलाजतु (6) सास्यक (7) चपला (8) रसक

♦️ उपरस: -

◼️ (1) गंधक (2) गैरिक (3) काशिस (4) सुवरि (5) लालक (6) मन: शिला (7) अंजन (8) कंकुष्ठ

♦️ सामान्य रस-

◼️ (1) कोयिला (2) गौरीपाषाण (3) नवसार (4) वराटक (5) अग्निजार (6) लाजवर्त (7) गिरि सिंदूर (8) हिंगुल (9) मुर्दाड श्रंगकम्

♦️ इसी प्रकार दस से अधिक विष हैं।

♦️ रस रत्नाकर अध्याय 9 में रसशाला यानी प्रयोगशाला का विस्तार से वर्णन भी है। इसमें 32 से अधिक यंत्रों का उपयोग किया जाता था, जिनमें मुख्य हैं-

◼️ (1) दोल यंत्र (2) स्वेदनी यंत्र (3) पाटन यंत्र (4) अधस्पदन यंत्र (5) ढेकी यंत्र (6) बालुक यंत्र (7) तिर्यक् पाटन यंत्र (8) विद्याधर यंत्र (9) धूप यंत्र (10) कोष्ठि यंत्र (11) कच्छप यंत्र (12) डमरू यंत्र।

♦️ रसायन

🔶 प्रयोगशाला में नागार्जुन ने पारे पर बहुत प्रयोग किए। विस्तार से उन्होंने पारे को शुद्ध करना और उसके औषधीय प्रयोग की विधियां बताई हैं। अपने ग्रंथों में नागार्जुन ने विभिन्न धातुओं का मिश्रण तैयार करने, पारा तथा अन्य धातुओं का शोधन करने, महारसों का शोधन तथा विभिन्न धातुओं को स्वर्ण या रजत में परिवर्तित करने की विधि दी है।

🔶 पारे के प्रयोग से न केवल धातु परिवर्तन किया जाता था अपितु शरीर को निरोगी बनाने और दीर्घायुष्य के लिए उसका प्रयोग होता था। भारत में पारद आश्रित रसविद्या अपने पूर्ण विकसित रूप में स्त्री-पुरुष प्रतीकवाद से जुड़ी है। पारे को शिव तत्व तथा गन्धक को पार्वती तत्व माना गया और इन दोनों के हिंगुल के साथ जुड़ने पर जो द्रव्य उत्पन्न हुआ, उसे रससिन्दूर कहा गया, जो आयुष्य-वर्धक सार के रूप में माना गया।

🔶 पारे की रूपान्तरण प्रक्रिया-इन ग्रंथों से यह भी ज्ञात होता है कि रस-शास्त्री धातुओं और खनिजों के हानिकारक गुणों को दूर कर, उनका आन्तरिक उपयोग करने हेतु तथा उन्हें पूर्णत: योग्य बनाने हेतु विविध शुद्धिकरण की प्रक्रियाएं करते थे। उसमें पारे को अठारह संस्कार यानी शुद्धिकरण प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। इन प्रक्रियाओं में औषधि गुणयुक्त वनस्पतियों के रस और काषाय के साथ पारे का घर्षण करना और गन्धक, अभ्रक तथा कुछ क्षार पदार्थों के साथ पारे का संयोजन करना प्रमुख है।

🔶 रसवादी यह मानते हैं कि क्रमश: सत्रह शुद्धिकरण प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद पारे में रूपान्तरण (स्वर्ण या रजत के रूप में) की सभी शक्तियों का परीक्षण करना चाहिए। यदि परीक्षण में ठीक निकले तो उसको अठारहवीं शुद्धिकरण की प्रक्रिया में लगाना चाहिए। इसके द्वारा पारे में कायाकल्प की योग्यता आ जाती है।

♦️नागार्जुन कहते हैं-

क्रमेण कृत्वाम्बुधरेण रंजित :.
करोति शुल्वं त्रिपुटेन काञ्चनम्।
सुवर्ण रजतं ताम्रं तीक्ष्णवंग भुजङ्गमा :.
लोहकं षडि्वधं तच्च यथापूर्व तदक्षयम्। - (रसरत्नाकार-3-7-89 -10)

🟣 अर्थात् - धातुओं के अक्षय रहने का क्रम निम्न प्रकार से है- सुवर्ण, चांदी, ताम्र, वंग, सीसा, तथा लोहा। इसमें सोना सबसे ज्यादा अक्षय है।

🔵 नागार्जुन के रस रत्नाकर में अयस्क सिनाबार से पारद को प्राप्त करने की आसवन (डिस्टीलेशन) विधि, रजत के धातुकर्म का वर्णन तथा वनस्पतियों से कई प्रकार के अम्ल और क्षार की प्राप्ति की भी विधियां वर्णित हैं।

🟡 इसके अतिरिक्त रसरत्नाकर में रस (पारे के योगिक) बनाने के प्रयोग दिए गये हैं। इसमें देश में धातुकर्म और कीमियागरी के स्तर का सर्वेक्षण भी दिया गया था। इस पुस्तक में चांदी, सोना, टिन और तांबे की कच्ची धातु निकालने और उसे शुद्ध करने के तरीके भी बताये गए हैं।

🟢 पारे से संजीवनी और अन्य पदार्थ बनाने के लिए नागार्जुन ने पशुओं और वनस्पति तत्वों और अम्ल और खनिजों का भी इस्तेमाल किया। हीरे, धातु और मोती घोलने के लिए उन्होंने वनस्पति से बने तेजाबों का सुझाव दिया। उसमें खट्टा दलिया, पौधे और फलों के रस से तेजाब (एसिड) बनाने का वर्णन है।

🟠 नागार्जुन ने सुश्रुत संहिता के पूरक के रूप में उत्तर तन्त्र नामक पुस्तक भी लिखी। इसमें दवाइयां बनाने के तरीके दिये गये हैं। आयुर्वेद की एक पुस्तक `आरोग्यमजरी 'भी लिखी।

 

🛕 मीनाक्षी मंदिर, मदुरै(तमिलनाडु)

🔶 दक्षिण भारत सुंदर मंदिरों के लिए विख्‍यात माना जाता है। इन्‍हीं में से एक मदुरै का मीनाक्षी मंदिर है। तमिलनाडु स्थित मां मीनाक्षी देवी का यह मंदिर सुंदर और महीन शिल्‍पकारी का उत्कृष्ट उदाहरण है।

🔶मीनाक्षी मंदिर का निर्माण राजा कुलसेकरा पंड्या ने 17वीं शताब्‍दी में कराया था। मंदिर में 8 खंभों पर लक्ष्‍मीजी की मूर्तियां बनी हुई हैं। इन खंभों पर भगवान शिव की पौराणिक कथाएं भी लिखी गई हैं। मंदिर के परिसर में एक पवित्र सरोवर भी है तो 165 फीट लंबा और 120 फीट चौड़ा है।

🔶 मंदिर का मुख्‍य गर्भगृह 3500 वर्षों से भी अधिक पुराना है। मीनाक्षी मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। यह मंदिर प्राचीन काल की बेहतरीन स्‍थापत्‍य कला और वास्‍तु का विशुद्ध उदाहरण है। तमिल साहित्‍य में अंकित कहानियों में इस मंदिर की काफी चर्चा की गई है।

 

अध्याय १० : श्लोक २५(10:25)
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् |
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालय: ॥25॥

शब्दार्थ :-
(अहम्) मैं (महर्षीणाम्) महर्षियोंमें (भृगुः) भृगु और (गिराम्) शब्दोंमें (एकम्) एक (अक्षरम्) अक्षर अर्थात् ओंकार (अस्मि) हूँ। (यज्ञानाम्) सब प्रकारके यज्ञोंमें (जपयज्ञः) जपयज्ञ और (स्थावराणाम्) स्थिर रहनेवालोंमें (हिमालयः) हिमालय पहाड़ (अस्मि) हूँ।

अनुवाद :-
मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ।


अध्याय १० : श्लोक २६(10:26)
अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद: |
गन्धर्वाणां चित्ररथ: सिद्धानां कपिलो मुनि: ॥26॥

शब्दार्थ :-
(सर्ववृृक्षाणाम्) सब वृृक्षोंमें (अश्वत्थः) पीपलका वृृक्ष (देवर्षीणाम्) देवर्षियोंमें (नारदः) नारद मुनि, (गन्धर्वाणाम्) गन्धर्वोंमें (चित्रारथः) चित्रारथ (च) और (सिद्धानाम्) सिद्धोंमें (कपिलः) कपिल (मुनिः) मुनि।

अनुवाद :-
मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।

              [ शेष क्रमश: कल ]


अधिकांश हिन्दू तथाकथित व्यस्तता और
समयाभाव के कारण हम सब सनातनियों
के लिए परम पूज्यनीय एवं अनु-करणीय
श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय करना छोड़
चुके हैं, इसलिए प्रतिदिन गीता जी के दो
श्लोकों को उनके हिंदी अर्थ सहित भेज
कर लगभग एक वर्ष के अंतराल [ 350
दिन × 2 श्लोक = 700 श्लोक ] में एक
बार समूह से जुड़े हजारों हिंदू बंधुओं को
सम्पूर्ण गीता जी का स्वाध्याय कराने का
यह प्रण लिया गया है .. आप सभी भी ये
दो श्लोक प्रतिदिन पढ़ने व पढ़वाने का
संकल्प लें lllll

 

ब्रह्मा , विष्णु , महेश (शिव)

🔶सनातन धर्म के आधार पर इन तीन त्रिदेवो से सृष्टि का निर्माण हुआ है।
अब हम बताते है कि विज्ञान के आधार पर इन तीन नामों का अर्थ क्या है और कैसे यह विज्ञान से जुड़े है?


 🟠ब्रह्मा : ब्रह्मा अर्थात जब मनुष्य जागता है तो उसके ह्रदय से ऊर्जाओं का विखण्डन होते जाता है सबसे पहले ह्रदय में प्राण शक्ति जिसे ब्रह्म कहते है उसे अव्याकृत ब्रह्म अर्थात सचेता ऊर्जा बनती है वह सचेता ऊर्जा से नाद ब्रह्म बनता है अर्थात अंतर्मन का निर्माण होता है जिसे ध्वनि उत्पन्न होती है फिर उसे व्याकृत ब्रह्म बनता है मस्तिष्क में चेतना उत्पन्न हो जाती है फिर उस चेतना से पंचमहाभूत बनते है जिसे ज्योति स्वरूप ब्रह्म कहते है सम्पूर्ण शरीर के होने का एहसास होता है फिर मनुष्य कर्म क्रिया प्रतिक्रिया करता है संसार में। अगर सोता है तो मनुष्य ज्योति स्वरूप ब्रह्म चेतना अर्थात व्याकृत ब्रह्म मे समा जाता है फिर वह नाद ब्रह्म में समा जाता है फिर वह नाद ब्रह्म अव्याकृत ब्रह्म समा जाता है वह अव्याकृत ब्रह्म प्राण ऊर्जा अर्थात ब्रह्म में समा जाता है इसलिए मनुष्य ही ब्रह्म है । और विज्ञान के आधार पर ऊर्जा सृष्टि का संचार करतीं है।

🔵विष्णु :- विष्णु अर्थात सीधे समझे तो विश्व का हर एक अणु नाम में ही सब कुछ छिपा है । जिसे हम देख पा रहे है वहीं विष्णु है । जो हमको दिख रहा है हमारा पालन पोषण कर रहा है जैसे पेड़ में फल आते है तो वो अणु से मिलकर ही बने है।


🟣महेश (शिव) : शिव अर्थात कुछ भी नहीं जहा कुछ भी नहीं     वहीं शिव है। जहा सब खाली है जहा हमारी आंखे कुछ देख सके वहीं शिव है।

🟦उदाहरण : एक पेड़ पर फल आता है तो उसके अंदर जो ऊर्जा आती है वो ब्रह्मा फिर वो जिससे मिलकर बना हुआ गई वह है विष्णु और जब वह अपने अस्तित्व से परे हो जाए तो शिव ।

 

महोदय, कृपया ध्यान दें,

   यद्यपि इसे (पोस्ट) तैयार करने में पूरी सावधानी रखने की कोशिश रही है। फिर भी किसी घटनाएतिथि या अन्य त्रुटि के लिए मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है । अतः अपने विवेक से काम लें या विश्वास करें।

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यह पोस्ट में दी गयी जानकारी धार्मिक विश्वास एवं आस्था एवं ग्रन्थों से पर आधारित है जो पूर्णता वैज्ञानिक नहीं है

 

भारतीय वैज्ञानिक नागार्जुन ने बनाया था उम्र बढ़ाने वाला रसायन। nagarjun the indian einstein

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